नौरोज़ विभिन्न साहित्यिक व कलात्मक क्षेत्रों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व प्रभावी कारक है। यह पर्व ईरान के प्राचीन लोगों की मूल्यवान धरोहर है और विभिन्न पीढ़ियों ने हमेशा बसंत ऋतु के आरंभिक दिनों में नौरोज़ मनाया है।
ईरानी वर्ष 1398 के आरंभिक दिन चल रहे हैं और बुलबलों की सुहानी आवाज़ के साथ पवन व पेड़ों की नई नई शाखाओं का संगीत, कानों तक पहुंचने वाली सबसे मनमोहक आवाज़ है। हम आप सभी श्रोताओं की सेवा में इस पर्व की बधाई पेश करते हैं और ईरानी संगीत के बारे में बात करना चाहते हैं जिस पर इस समय नौरोज़ और बसंत का प्रभाव नज़र आता है।
ईरानी पठार और उसके आस पास स्थित सांस्कृतिक क्षेत्रों के एक विशाल भाग में नौरोज़ का जश्न मनाया जाता है। अगर भौगोलिक शब्दावली में कहना चाहें तो यह प्राचीन पर्व पश्चिमी व पश्चिमोत्तरी चीन की सीमाओं, मध्य एशिया, लघु एशिया, मध्यपूर्व और जार्डन नदी के दूसरे छोर तक मनाया जाता है। नौरोज़, प्राचीन जातियों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव का एक अहम कारक है और इन जातियों का संयुक्त बिंदु उनके रहन सहन व जीवन बिताने की शैली और उनकी संस्कृति रही है। नौरोज़ के संस्कारों को ईरान के अति प्राचीन दस्तावेज़ों और किताबों में देखा जा सकता है और यह समझा जा सकता है कि मौसम के परिवर्तन से संबंधों उत्सवों में संगीत की मूल भूमिका हुआ करती थी।
संगीत को सबसे सुंदर और सबसे कोमल कला कहा जाता है और इसकी भाषा और इसका संदेश, समरसता, दोस्ती व आंतरिक भावनाओं को बयान करना है। दुनिया के सभी लोग अपने सुख-दुख, पीड़ा, भावनाओं और आस्थाओं को संगीत की भाषा में बयान करते हैं। स्वाभाविक है कि उत्सवों व ख़ुशियों के अवसरों पर भी संगीत, उपस्थित लोगों की भावनाओं के वर्णन का एक अहम साधन होता है और ईरानियों का सबसे बड़ा जश्न, नौरोज़ भी इस सिद्धांत से अलग नहीं है।
एक साधारण वर्गीकरण में ईरान में नौरोज़ से संबंधित संगीत को दो भागों में बांटा जा सकता है। नौरोज़ का परंपरागत संगीत और नौरोज़ का धार्मिक संगीत। नौरोज़ के परंपरागत संगत में विभिन्न प्रकार के गीत शामिल हैं जो इस प्राचीन उत्सव के दिनों में नौरोज़ की ख़ुशियों और संस्कारों को बयान करते हैं। इस प्रकार का संगीत केवल नौरोज़ के परंपरागत संस्कारों व रीति-रिवाजों से भी संबंधित हो सकता है और नौरोज़ के दिनों के अलावा भी ख़ुशियों के अन्य अवसरों पर इसे गाया-बजाया जा सकता है।
वे गीतु जो केवल नौरोज़ से संबंधित हैं उनमें पूरे ईरान में "नौरोज़ ख़ानी" के नाम से जाने वाले नौरोज़ी गीतों की तरफ़ इशारा किया जा सकता है। नौरोज़ के दिनों में देश भर के कलाकार विभिन्न स्थानों पर संगीत के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं और इसी तरह कुछ कलाकार सड़कों के किनारे और गली कूचों में भी नौरोज़ के विशेष गीत गाते हैं और बहार आने की शुभ सूचना देते हैं। उनके गीत सुनने वाले उन्हें इनाम, वस्त्र और खाने पीने की चीज़ें देते हैं। ये रिवाज इस्लाम के बाद धार्मिक संस्कारों से भी जुड़ गए और रमज़ान के अवसर पर भी लोग धार्मिक गीत गा कर लोगों को इस पवित्र महीने के आगमन और इसी तरह सहरी या इफ़्तारी का समय होने की सूचना देने लगे।
नौरोज़ के गीतों में धार्मिक निशानियां, उनमें से अनेक के आपसी जुड़ाव का कारण हैं, उदाहरण स्वरूप एक गीत के बोलों का अनुवाद इस प्रकार है। "फूल, फुलवारी में आया है, बुलबुल बाग़ में आई है, हे मुहम्मद के समुदाय वालो! सुलतान का नौरोज़ आया है। इसी तरह से एक अन्य गीत में कहा गया हैः बसंत आया है, बसंत आया है, बसंत का स्वागत है। अली ज़ुल्फ़ेक़ार के साथ आए हैं, उनका स्वागत है।
ईरान के प्राचीन शासकों के शासन केंद्रों व राजधानियों में नौरोज़ का अधिकतर गीत-संगीत पारंपरिक शैली में और क्लासिकल अंदाज़ में गाया बजाया जाता था। यह गीत-संगीत नौरोज़ से संबंधित रिवाजों व संस्कारों के साथ दरबार और शासक परिवार के निकट, देश की राष्ट्रीय पहचान और संस्कृति को मज़बूत बनाने के एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। इनमें से बहुत से संस्कार, पिछले कुछ दशकों में समाप्त हो चुके हैं, जैसे सलामे नौरोज़ का रिवाज समाप्त हो गया। यह संस्कार सलामे मुबारक के नाम से भी जाना जाता था और उसमें संगीत के साथ विशेष रस्में हुआ करती थीं। इसी तरह शाही तोपख़ाने से तोपों की सलामी हुआ करती थी जिसके दौरान सैनिक बैंड बजता था। इसी तरह नया साल आरंभ होते ही ढोल व नक़्क़ारे बजाने की परंपरा थी जो अब दिखाई नहीं पड़ती।
नौरोज़ के संगीत से संबंधित एक भाग के रूप में नौरोज़ की रस्में शुरू होने की घोषणा में नक़्कारे बजाने वालों और नक़्क़ार ख़ानों की भूमिका भी अहम है। यह परंपरा अब केवल पवित्र नगर मशहद में इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के मज़ार के नक़्क़ार ख़ाने में बाक़ी रह गई है और सामूहिक संचार माध्यमों द्वारा इसके सीधे प्रसारण के कारण यह नया साल आरंभ होने की घोषणा के लिए एक राष्ट्रीय गीत में बदल गई है। नौरोज़ इसी तरह से ईरान की विभिन्न जातियों के संगीत के भीतर तक पहुंचा हुआ है और आज़रबाइजान, ख़ुरासान, बलोचिस्तान समेत विभिन्न क्षेत्रों की जातियों के संगीत में नौरोज़ के वर्णन और बसंत के आगमन के संबंध में सुंदर गीत-संगीत देखे व सुने जा सकते हैं।
स्वाभाविक सी बात है कि ईरान के उपासना केंद्रों में मौसम के परिवर्तन के समय जो प्राचीन संगीत बजाया जाता था उसका कोई दस्तावेज़ अब बाक़ी नहीं बचा है लेकिन इसके बावजूद प्राचीन सभ्यताओं के जो खंडहर बाक़ी बचे हैं उनमें कुछ ऐसे चित्र अवश्य हैं जिनका संबंध संगीत से है। इन चित्रों में अधिकतर दरबार और सरकारी समारोहों के दृश्यों को दिखाया गया है। इन चित्रों के आधार पर कहा जा सकता है कि नए साल के जश्न में प्राचीन सभ्यताओं में भी संगीत का इस्तेमाल किया जाता था।
ईलामी सभ्यता में भी तारों वाले वाद्य यंत्रों का सरकारी समारोहों में प्रयोग किया जाता था और उस काल के शिलालेखों और अन्य अवशेषों में वीणा जैसा एक वाद्य यंत्र दिखाई देता है और कहा जा सकता है कि प्राचीन ईरान के शासकों के दरबार में इस यंत्र को सरकारी वाद्य यंत्र की हैसियत हासिल थी। वीणा जैसा वह वाद्य यंत्र दरबार के सरकारी समारोहों के लिए विशेष था जबकि उसी से मिलता जुलता लेकिन थोड़ा लम्बा एक दूसरा यंत्र भी था जिस धार्मिक समारोहों में बजाया जाता था।
ईरान के प्राचीन संगीत में निश्चित रूप से नौरोज़ शब्द का संबंध इस पर्व के संस्कारों व परंपराओं से है और आज के संगीत में नौरोज़ सबा नामक तराना इन्हीं परंपराओं व नौरोज़ के संस्कारों से जुड़ा हुआ है। नवीं शताब्दी हिजरी में ईरान के महान शायर, संगीतकार व कलाकार ने नौरोज़ से संबंधित संस्कारों से संबंधित संगीत बहुवचन के लिए “नौरोज़ात” शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने ईरानी संगीत के वर्गीकरण के लिए नौरोज़ के अवसर पर बजाए और गाए जाने वाले गीत संगीत के विभिन्न नाम रखे हैं जैसे नौरोज़ अस्ल, नौरोज़ हेजाज़ी, नौरोज़ ख़ारा, नौरोज़ अजम और नौरोज़ अरब इत्यादि। उनका कहना है कि नौरोज़ के संगीत का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
ईरान के क्लासिकल और राष्ट्रीय संगीत के अलावा भी देश के विभिन्न क्षेत्रों में बहार और नौरोज़ के वर्णन के लिए विभिन्न प्रकार के गीत गाए जाते थे। चूंकि ये गीत अधिकतर पेशेवर और दक्ष लोगों द्वारा गाए जाते थे इस लिए इनमें अधिक जटिलता होती थी और स्वरूप की दृष्टि से भी ये अधिक सुंदर होते थे। ये गीत प्रायः एक या कई वाद्य यंत्रों के साथ गाए जाते थे। अलबत्ता नौरोज़ के अवसर पर कुछ छोटे मोटे नाटकों का भी संगीत के साथ मंचन होता था जो अब प्रचलित नहीं रह गए हैं। इस प्रकार के कुछ नाटक कुछ दशकों पहले आज़रबाइजान प्रांत के देहातों में प्रचलित थे।
ईरान में नौरोज़ के अवसर विभिन्न तरह के भेस बदल कर, रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करके और चेहरों पर मुखौटा लगा कर सड़कों व गलियों में अपनी कला का प्रदर्शन करने वाले भी नौरोज़ के गीत गाने वालों में समझे जाते थे। ये लोग गीत गा कर और हंसी मज़ाक़ करके लोगों का मनोरंजन करके उन्हें नौरोज़ और बहार के आगमन की शुभ सूचना देते थे। ज्ञात रहे कि हालिया शताब्दी में आने वाले सामाजिक परिवर्तनों के कारण इस प्रकार के रीति-रिवाज समाप्त हो गए हैं और अब केवल इतिहास में ही उनका वर्णन मिलता है।